tag:blogger.com,1999:blog-254676482008-05-07T17:25:01.513-07:00आईनाJagdish Bhatiahttp://www.blogger.com/profile/17093503828934988942noreply@blogger.comBlogger24125tag:blogger.com,1999:blog-25467648.post-1153499958878304922006-07-21T09:39:00.000-07:002007-04-05T10:53:18.929-07:00मेरा नया घर<p><span style="font-family:Arial;"><span style="font-size:130%;">कुछ सरकारी अफसर शाहों और इंटरनेट प्रदताओं की गफलत के चलते हमें अपना घर छोड़ना पड़ा और साहब अपना आईना उठा कर हम </span><a href="http://aaina2.wordpress.com" target="_self"><span style="font-size:130%;">वर्डप्रैस</span></a><span style="font-size:130%;"> पर आ गये हैं। यह हमारा ब्लागस्पाट पर आखिरी और वर्डप्रैस पर पहला पोस्ट है। अपनी मर्जी से आदमी चाहे वीजा ले कर अमेरिका, जर्मनी, इटली या कुवैत जा कर रहने लगे मगर जब दूसरे मजबूर करदें घर छॊड़ने को तो मन बहुत दुखता है।</span></span></p><br /><p><span style="font-family:Arial;font-size:130%;"> सन १९४७ के यही दिन रहे होंगे जब मेरे माता पिता पाकिस्तान के एक गांव के अपने घर को छोड़ने पर मजबूर हो गये थे एक आजाद देश की खुली हवाओं में सांस लेने की एक उम्मीद लेकर.......</span></p><div class="blogger-post-footer"><!-- Start Bravenet.com Service Code --> <script language="JavaScript" type="text/javascript" src="http://pub11.bravenet.com/counter/code.php?id=393917&usernum=928795354&cpv=2"> </script> <!-- END DO NOT MODIFY --></div>Jagdish Bhatiahttp://www.blogger.com/profile/17093503828934988942noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-25467648.post-1152852570461419932006-07-13T21:49:00.000-07:002007-04-05T10:54:47.789-07:00गरीब के सपने और सरकार की तोता रटंत<p><span style="font-size:130%;">दिल्ली में ऑटो पर बैठना हो तो यह मान कर चलना पड़ेगा कि अधिकतर ये लोग फालतू पैसे मांगते हैं और कई बार बद्तमीजी भी करते हैं। मगर उस दिन जो अनुभव मेरे साथ हुआ आपको भी बताता हूं। दोपहर के समय प्रगती मैदान से निकला तो ऑटो ढूंढ रहा था बाराखंबा रोड जाने के लिये। शनिवार होने की वजह से सड़क पर आवाजाही कुछ कम थी, मैं टहलता हुआ सुप्रीम कोर्ट वाली सड़क पर पहुंच गया। गर्मी और उमस से इतना पसीना बह रहा था जितना कि सुबह नल में पानी भी नहीं आता। एक ऑटो वाला मेरे सामने से निकला, मैंने इशारा किया मगर वो बिना देखे आगे निकल गया। आगे जा कर उसे लाल बत्ती पर रुकते देख मै भी तेज कदमों से उसके पास पहुंच गया। "बाराखंबा चलोगे?" उसने जवाब नहीं दिया मगर इशारे से ही बैठने को कहा और ऑटो स्टार्ट कर दिया। "कितने पैसे लोगे?" मेरे इस सवाल का भी जवाब नहीं आया। जाने किस मस्ती में डूबा था वह। कोई ५५ की उम्र रही होगी, सांवला दुबला शरीर। "कितने पैसे लोगे?" मैंने इस बार जरा जोर से दोहराया। अपने बैक मिरर को मेरी तरफ मोड़ते हुए बोला "हजार लाख रुपये कुछ दे देना साहब, अपनी भी गरीबी कट जायेगी" और एक खिलंदड़ सी हंसी हंस दिया वो। "लाख रुपये से गरीबी कट जायेगी?" पुछते हुए मैंने देखा, एक चमक थी उसकी आंखों में। "गरीबी अमीरी तो मन की अवस्था है साहब, मन में संतुष्टी न हो तो करोड़ों होते हुए भी आदमी गरीब ही रहता है।" अपनी धुन में बोलना शुरू कर दिया उसने "मेरे तीन बेटे हैं सर, तीनॊ को अच्छी शिक्षा दी है, बड़े वाला पीएचडी कर रहा है। तीनों की शादी भी एजुकेटिड लड़कियों से ही करूंगा। छह लोग मिल कर एजुकेशनल इंस्टीट्यूट खोल लेंगे। बहुत फीस होती है और खर्चा खास कुछ भी नहीं। साल का एक करोड़ तो कहीं नहीं गया।" वो अपना गणित मुझे समझा रहा था। "ऎसी होंडा सिटी तो साल में छह खरीद लूंगा" आगे जाती गाड़ी की और इशारा करते हुए जोर का ठहाका लगाया उसने। "एक ही बार में सारे कष्ट कट जायेंगे" कहते हुए अपना हाथ जोर से हवा में उठा दिया जैसे अपने कष्टों को गंगा में बहा रहा हो। मुझे "वक्त" फ़िल्म में लाला बने बलराज साहनी की याद आ गई मगर ऑटो वाले की आंखों की चमक और आत्मविश्वास देख मुझे लगा कि इस आत्मविश्वास के आगे तो बड़े से बड़ा जलजला भी रुक जाये। सच में उसके सपनों पर यकीन हो गया था मुझे।</span></p><br /><p><span style="font-size:130%;">मगर आज जब मनमोहन सिंह मुंम्बई धामकों के बाद कहते हैं कि "आतंकवाद से सख्ती से निपटेगी सरकार" तो हमें यकीन क्यों नहीं होता? उनकी बातों में वह आत्मविश्वास क्यों गायब होता है? सरकार की बातें हमें तोता रटंत जैसी क्यों लगती है। </span></p><div class="blogger-post-footer"><!-- Start Bravenet.com Service Code --> <script language="JavaScript" type="text/javascript" src="http://pub11.bravenet.com/counter/code.php?id=393917&usernum=928795354&cpv=2"> </script> <!-- END DO NOT MODIFY --></div>Jagdish Bhatiahttp://www.blogger.com/profile/17093503828934988942noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-25467648.post-1151501830595152662006-06-28T06:37:00.000-07:002007-04-05T10:56:18.142-07:00कृष्णा टु सुदामा "थैंक्यू बड्डी, वैरी टेस्टी सत्तू"-२<p><span style="font-size:130%;">अमित जी ने मेरी पिछली पोस्ट </span><a href="http://aaina1.blogspot.com/2006/06/blog-post_27.html" target="_self"><span style="font-size:130%;">कृष्णा टु सुदामा "थैंक्यू बड्डी, वैरी टेस्टी सत्तू"</span></a><span style="font-size:130%;"> के जवाब में एक किस्सा दिया है कि किस प्रकार महिलाओं को बस में सीट देने के बाद आभार तक व्यक्त नहीं करतीं। अमित जी लिखते हैं </span></p><br /><p><span style="font-size:130%;">"</span><span style="font-size:130%;color:#ffff00;">पर बीते ज़माने की किसी महिला को यदि सीट दी जाती, तो आभार प्रकट करना तो<br />दूर, वे तो बैठती भी ऐसे अकड़ के कि जैसे सीट दहेज में मायके से लाईं हों<br />जिस पर उनका सर्वस्व अधिकार है!! होता तो कुछ नहीं पर ऐसी महिलाओं से बड़ी<br />कोफ़्त होती कि एक तो इतना थका मांदा होने के बाद भी सीट दी और ऐसे ऐंठ के<br />साथ उस पर बैठीं कि जैसे उन्होंने एहसान किया बैठ कर!!" </span></p><br /><p><span style="font-size:130%;">एक किस्सा मैं भी सुनाता हूं आपको</span></p><br /><p><span style="font-size:130%;">कई साल पहले की बात है एक बार मैं शाम के समय ट्रेन से दिल्ली से रोहतक जा रहा था। साथ की सीट पर एक युवक सांध्य टाईम्स (दिल्ली में मिलने वाला एक सांध्य दैनिक) पढ़ रहा था। पढ़ते पढ़ते जब उसने पन्ना पलटा तो एक समाचार पर मेरी नजर गई "सुनील दत्त अस्पताल में" मैने कोतुहल से पूछ लिया "क्या हो गया सुनील दत्त साहब को? " पता है क्या जवाब मिला "मैं के डाक्टर लग रया हूं?"</span></p><br /><p><span style="font-size:130%;">इस प्रकार के कई किस्से आप ने भी सुने होंगे। आपके द्वारा और मेरे द्वारा दिये गये इन किस्सों से यह तो स्पष्ट हो गया कि हम दोनो मानते हैं कि हमारे समाज का एक चरित्र यह भी है। अब आप बताईये जो बंदा सीधी सी बात का सीधा सा जवाब भी नहीं देता उस से थैंक्यू की उम्मीद कैसे कर सकता हूं। जो महिला ऎंठ के साथ यूं बैठे जैसे एहसान कर दिया उस से आप धन्यवाद की उम्मीद कैसे कर सकते हैं?</span></p><br /><span style="font-size:130%;">मगर हमारे महानगरों में जहां अभिजात वर्ग है वहां थैंक्यू और सॉरी की औपचारिकताएं बहुत हद तक निभाई जातीं हैं इस में कोई दो राय नहीं है।<br /><br /></span><p><span style="font-size:130%;">मैं तो इस से आगे बढ़ कर कह रहा हूं कि उन्हें मुंबई में ही अशिष्ट्ता दिख गई जहां व्यापक रूप से शिष्ट अभिजात्य वर्ग रहता है, हमारे देहात तो देखे ही नहीं। <span style="font-family:Verdana;">रीडर्स डाइजेस्ट वालों को हो सकता है कि हमारी लट्ठ्मार होली देख कर उस में भी हिंसा नजर आ जाए मगर उसमें छिपे प्यार को तो एक भारतीय ही समझ सकता है ना।</span></span></p><br /><p><span style="font-size:130%;">उपरोक्त कथा में जो एक हरयाणवी चरित्र नजर आता है उसे तो सिर्फ़ आप और हम ही समझ सकते हैं कोई विदेशी नहीं। हमारे पंजाब में माएं अपने बच्चों को बहुत प्यार से "मोया" (dead) कह कर बुलातीं हैं, मां के इस प्यार को एक पंजाबी ही समझ सकता है, इसे समझने के लिये हमें किसी विदेशी चश्मे की जरूरत नहीं है। </span></p><br /><p><span style="font-size:130%;">मुझे अपने समाज के इस चरित्र से कोई शिकायत नहीं है, इससे पलट मुझे यह चरित्र बहुत भाता है।</span></p><br /><p><span style="font-size:130%;">यहा कृष्ण को अपने सुदामा के सत्तू अभी भी उतने ही स्वादिष्ट लगते हैं। </span></p><br /><p></p><div class="blogger-post-footer"><!-- Start Bravenet.com Service Code --> <script language="JavaScript" type="text/javascript" src="http://pub11.bravenet.com/counter/code.php?id=393917&usernum=928795354&cpv=2"> </script> <!-- END DO NOT MODIFY --></div>Jagdish Bhatiahttp://www.blogger.com/profile/17093503828934988942noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-25467648.post-1151411168583550782006-06-27T05:26:00.000-07:002007-04-05T10:57:28.292-07:00कृष्णा टु सुदामा "थैंक्यू बड्डी, वैरी टेस्टी सत्तू"<p> </p><br /><p><span style="font-family:Verdana;font-size:130%;">रीडर्स डाइजेस्ट पत्रिका ने मुंबई को अशिष्ट नागरिको का शहर बताया है।</span></p><br /><p><span style="font-family:Verdana;font-size:130%;">अपने चिट्ठाकारों ने इतना कुछ लिख दिया इस विषय पर कि पिछली अनुगूंज पर भी इतना नहीं लिखा।</span></p><br /><p><span style="font-family:Verdana;font-size:130%;">मेरा मानना यह है कि इस प्रकार के सर्वे वैज्ञानिक तरीके से नहीं कराए जाते इसलिए यह विश्वसनीय नहीं होते।<br />जब चुनाव के वक्त हमारे यहां सभी न्यूज चैनल वैज्ञानिक(?) तरीके से सर्वे कराते हैं तो भी ज्यादातर सर्वे गलत निकल आते हैं। रीडर डाईजेस्ट वालों को मुंबई के ग्राहक चाहिएं तो मुंबई की बात करते हैं, कभी हमारे गांव देहात की लट्ठमार होली और लट्ठमार बोली देखी नहीं उन्होने। </span></p><br /><p><span style="font-family:Verdana;font-size:130%;">बात बात पर सॉरी या थैंक्यू कहने का रिवाज हमारे यहां वैसे भी नहीं है और हम इसे अशिष्टता नहीं मानते। </span></p><br /><p><span style="font-family:Verdana;font-size:130%;">किसी समाज का मर्म उस समाज में रहने वाले ही जानते हैं, औपचारिकताओं में जीने वाला समाज नहीं है हमारा। कोई दोस्त जब बहुत दिनों के बाद मिले तो झट जा कर गले मिलने का रिवाज है हमारे यहां। मिलने से पहले यह नहीं सोचते कि गर्मी में आया है, पसीने आ रहे हैं और शरीर से दुर्गंध न आती हो। </span></p><br /><p><span style="font-family:Verdana;font-size:130%;">कृष्ण के घर सुदामा आए तो झट भाग कर गये और गले लगा लिया, मैले कपड़े नहीं देखे। प्रोटोकोल भी नहीं सोचा। सत्तू छीन कर खा लिये। क्या कृष्ण भगवान ने थैंक्यू कहा होगा सत्तू के लिये। "थैंक्यू बड्डी, वैरी टेस्टी सत्तू"। खींच कर अपने पास बिठा लिया, सैकरेटरी से नहीं कहा की जा कर स्वागत करॊ और मेहमानों के कमरे में ठहरा दो। </span></p><br /><p><span style="font-family:Verdana;font-size:130%;">यह कृष्ण सुदामा हमारे समाज में अभी भी हैं। इन गोरे लोगों को क्या समझ। </span></p><br /><p> </p><div class="blogger-post-footer"><!-- Start Bravenet.com Service Code --> <script language="JavaScript" type="text/javascript" src="http://pub11.bravenet.com/counter/code.php?id=393917&usernum=928795354&cpv=2"> </script> <!-- END DO NOT MODIFY --></div>Jagdish Bhatiahttp://www.blogger.com/profile/17093503828934988942noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-25467648.post-1151254071619498582006-06-25T09:47:00.000-07:002007-05-22T07:54:36.365-07:00बालमन पर इमरजेंसी का डर<p align="left"><small><span style="font-family:Verdana;"><span style="font-size:130%;">आज </span><a href="http://neerajdiwan.blogspot.com/2006/06/blog-post_24.html" target="_self"><span style="font-size:130%;">नीरज भाई ने लिखा</span></a><span style="font-size:130%;"> तो मुझे भी आपतकाल का एक किस्सा याद आ गया। मैं दस साल का था, छठी कक्षा में पढ़ता था। इतनी राजनैतिक या सामाजिक समझ तो नहीं आई थी मगर यह पता था कि सरकार ने कुछ नियंत्रण लागू किये हैं आम लोगों पर। इमरजेंसी की इतनी समझ थी कि एक दिन आधी छुट्टी के समय स्कूल के मैदान में घूमते हुए जब सूर्यदेव बादल से घिर गए तो अपने सहपाठी से मैंने कहा था "लगता है सूरज को भी इमर्जेंसी लग गई है"।</span></span></small></p><br /><p align="left"><small><span style="font-family:Verdana;font-size:130%;">अफ़वाहों का बाजार गरम रहता था और लोगों में सब से ज्यादा भय था जबरन नसबंदी को ले कर। </span></small></p><br /><p align="left"><small><span style="font-family:Verdana;font-size:130%;">एक दिन सरकारी टीकाकरण अभियान के अंतर्गत हमारे स्कूल में बच्चों को टीके लगाये जाने थे कि स्कूल में अफ़वाह उड़ी कि बच्चों को नसबंदी के टीके लगाये जा रहे हैं। सुनने में आया कि जिस भी बच्चे को यह टीका लगेगा बड़े होने पर उसके बच्चे नहीं हो पाएंगे। आप समझ सकते हैं कि बाल मन पर इसका कैसा प्रभाव हुआ होगा। एक एक दो दो कर के बच्चे खिसकने लगे घर की ओर। टीचर भी बहुत कम नजर आ रहे थे स्कूल में। आधी छुट्टी तक लगभग सारा स्कूल खाली हो चुका था। मैं भी बस्ता उठा भाग खड़ा हुआ घर की ओर। गेट पर चौकीदार भी नदारद था उस दिन। रास्ते में डरता रहा कि जल्दी घर आने का क्या कारण दूंगा घर पहूंच कर। मगर मुझसे पहले महल्ले के जो बड़े बच्चे स्कूल से घर गए थे शायद उनसे पूरी बात का पता चल गया था सो न तो घर वालों ने कुछ पूछा और न ही मैंने बताया। </span></small></p><div class="blogger-post-footer"><!-- Start Bravenet.com Service Code --> <script language="JavaScript" type="text/javascript" src="http://pub11.bravenet.com/counter/code.php?id=393917&usernum=928795354&cpv=2"> </script> <!-- END DO NOT MODIFY --></div>Jagdish Bhatiahttp://www.blogger.com/profile/17093503828934988942noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-25467648.post-1150691901499024292006-06-18T21:38:00.000-07:002007-04-05T10:59:48.641-07:00संवेदनशील बच्चे<small><br /><p><span style="font-family:Mangal;font-size:130%;">बच्चे बहुत संवेदनशील होते हैं। उनकी आवश्यकताएं भौतिक कम और भावनात्मक ज्यादा होती हैं।</span></p><br /><p><span style="font-family:Mangal;font-size:130%;">भावनात्मक इस लिये क्योंकि आजकी भागती दौड़ती दुनिया में हर पिता का ज्यादा जोर अपने बच्चों की भौतिक आवशकताओं को पूरा करने में रहता है। कहीं ऐसा तो नहीं कि हम केवल अच्छे कपड़े, घर पर बच्चों के लिये कंप्यूटर, अच्छे स्कूल, महीने में एक या दो बार घर से बाहर खाना और जेब खर्च दे कर यह सोच लेते हैं कि हम अपना धर्म बहुत अच्छी तरह निभा रहे हैं। सप्ताह में छ्ह दिन काम में व्यस्त और इतवार को पूरा दिन सो कर थकान मिटाओ।</span></p><br /><p><span style="font-family:Mangal;font-size:130%;"> क्या बच्चों को अपने पिता के साथ बिताने के लिये बेहतर खुशनुमा समय मिल पाता है? क्या हमारे बच्चे हमें अपना सबसे अच्छा दोस्त समझते हैं? क्या हमारे बच्चे अपने मन में उठी हर नई भावना हम से सहजता से बांट सकते हैं? क्या बच्चे में यह विश्वास है कि जब भी उसे कोई परेशानी होगी तो मेरे पिता मेरे लिये सब ठीक कर देंगे। </span></p><br /><p><span style="font-size:130%;"></span> </p></small><div class="blogger-post-footer"><!-- Start Bravenet.com Service Code --> <script language="JavaScript" type="text/javascript" src="http://pub11.bravenet.com/counter/code.php?id=393917&usernum=928795354&cpv=2"> </script> <!-- END DO NOT MODIFY --></div>Jagdish Bhatiahttp://www.blogger.com/profile/17093503828934988942noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-25467648.post-1150552652806654202006-06-17T06:57:00.000-07:002006-06-17T06:57:32.813-07:00अपने प्यारे पापा को<p align="left">कल फ़ादर डे पर</p><br /><p align="left">सुबह सुबह ऑफ़िस जाते हुए</p><br /><p align="left">अपने प्यारे पापा को जब मैं ग्रीटिंग कार्ड दूंगी</p><br /><p align="left">थैंक्यू बेटे कह कर वे मुस्कुराएंगे</p><br /><p align="left">मगर हल्के से जरूर झेंप जाएंगे।</p><br /><p align="left">दो बातें भी नहीं कर पाएंगे</p><br /><p align="left">ऑफ़िस को देर हो जाएगी।</p><br /><p align="left">शाम को काम से फ़िर देर से आएंगे।</p><br /><p align="left">बहुत ही अच्छे हैं मेरे पापा,</p><br /><p align="left">जो भी मांगो ले कर देते हैं।</p><br /><p align="left">मगर अक्सर कंप्यूटर पर गेम्स खेलते हुए सोचती हूं</p><br /><p align="left">काश कभी हम अपने पापा के साथ अंत्याक्षरी खेल पाते...... </p><br /><br /><div class="blogger-post-footer"><!-- Start Bravenet.com Service Code --> <script language="JavaScript" type="text/javascript" src="http://pub11.bravenet.com/counter/code.php?id=393917&usernum=928795354&cpv=2"> </script> <!-- END DO NOT MODIFY --></div>Jagdish Bhatiahttp://www.blogger.com/profile/17093503828934988942noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-25467648.post-1150212677458560922006-06-13T08:31:00.000-07:002006-06-13T08:38:18.483-07:00दिस इज़ हिंडी न्यूजपेपर फ़्रॉम डेल्ही<p align="left">आज नवभारतटाईम्स के दिल्ली संस्करण के कुछ समाचार:</p><br /><p align="left">(यह तो मात्र एक उदाहरण है, आप किसी भी दिन का अंक देखिए, समाचार ऎसे ही मिलेंगे)</p><br /><p align="left">१.डीयू के स्कूल ऑफ़ ओपन लर्निंग में प्रफ़ेशनल कोर्स नहीं</p><br /><p align="left">२. एडमिशन फ़ॉर्म जमा कराने 10 हजार स्टूडेंट्स पहुंचे</p><br /><p align="left">३. डीयू में पीजी लेवल के 4 नए फार्मा कोर्स</p><br /><p align="left">४. कड़कड़डूमा में पार्किंग की टेंशन होगी खत्म</p><br /><p align="left">५.नोएडा में बिना एनओसी के चल रही है इंडस्ट्रीज</p><br /><p align="left">६. बढ़ रहा है नए फ़ीचर वाले मोबाईलों का क्रेज</p><br /><p align="left">संपादकीय भी एसी ही भाषा में है, पूरा संपादकीय न दे कर इंगलिश के प्रयुक्त शब्द यहां दे रहा हू:</p><br /><p align="left">पब्लिक, पॉलिटिक्स, सेंट्रल गवर्नमेंट, फेवर, परसेंट, सेक्टर, डिक्लेयर्ड, विलेन, डायबटीज।</p><div class="blogger-post-footer"><!-- Start Bravenet.com Service Code --> <script language="JavaScript" type="text/javascript" src="http://pub11.bravenet.com/counter/code.php?id=393917&usernum=928795354&cpv=2"> </script> <!-- END DO NOT MODIFY --></div>Jagdish Bhatiahttp://www.blogger.com/profile/17093503828934988942noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-25467648.post-1149948494715475972006-06-10T07:08:00.000-07:002007-04-05T11:05:12.693-07:00आपके ब्लाग पर मेरा फ़ोटो तो नहीं?<p align="left"><a href="http://www.blogger.com/profile/19479705" target="_self"><span style="font-size:130%;">समीर भाई</span></a><span style="font-size:130%;"> ने अपनी पोस्ट </span><a href="http://udantashtari.blogspot.com/2006/05/blog-post_04.html" target="_self"><span style="font-size:130%;">अपना ब्लाग बेचो, भाई.........</span></a><span style="font-size:130%;"> में छाया जी को लिखा कि "<strong>जरा फ़ोटू वगेरह लगाओ और वो भी नाम भी साथ मे.कैसी भी फोटो हो, लगा दो" </strong>तो हमें भी जोश आ गया और अपना फ़ोटो लगा दिया अपने ब्लाग पर। याहू ३६० पर अपना ब्लाग तो बना रखा था जिस पर कभी लिखना शुरू नहीं किया था वहाँ के प्रोफ़ाईल पर भी फ़ोटो चिपका दिया। यहाँ आपको बता दें कि फ़ोटॊ लगाने से पहले हमारे मन में कई प्रकार के विचार आए। हमने सुन रखा था कि इटरनेट पर कई लोग फ़ोटो का दुरुपयोग भी कर लेते हैं। फ़िर सोचा हम कोई जान ईब्राहिम तो है नहीं जिसकी फ़ोटो कापी कर के लोग अपने पास सेव कर लेंगे और बेधड़क हो के लगा दिया अपना फ़ोटो। </span></p><br /><br /><p align="left"><span style="font-size:130%;">हैरानी तो आज तब हुई जब एक बंदे </span><a href="http://360.yahoo.com/profile-w9qkGNY_erJgQh7cKwnc62flFKbW7MKepA--?cq=1" target="_self"><span class="nickname" style="font-size:130%;">Psycho Nathan</span></a><span style="font-size:130%;"> का ईमेल आया जो मुझे अपने ३६० याहू पर अपना दोस्त बनाना चहता था। अब जब इस बंदे के </span><a href="http://360.yahoo.com/profile-w9qkGNY_erJgQh7cKwnc62flFKbW7MKepA--?cq=1" target="_self"><span style="font-size:130%;">ब्लाग</span></a><span style="font-size:130%;"> पर जब गया तो देखता क्या हूं कि उसने अपने प्रोफ़ाईल में अपनी जगह मेरी फ़ोटो लगा रखी थी। अब हालत यह है कि मैंने अपने ब्लाग से अपनी फ़ोटो हटा ली है मगर मेरी फ़ोटो उसके ब्लाग पर लगी हुई है। कोई बताए इसका कोई हल है? </span></p><div class="blogger-post-footer"><!-- Start Bravenet.com Service Code --> <script language="JavaScript" type="text/javascript" src="http://pub11.bravenet.com/counter/code.php?id=393917&usernum=928795354&cpv=2"> </script> <!-- END DO NOT MODIFY --></div>Jagdish Bhatiahttp://www.blogger.com/profile/17093503828934988942noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-25467648.post-1149677524964042452006-06-07T03:52:00.000-07:002006-06-07T03:52:05.030-07:00Windows XP इस्तेमाल करने वालों के लिएमेरे एक मित्र जो Windows XP इस्तेमाल करते हैं के साथ यह खतरनाक हादसा हुआ। यहां बता कर आप सब को आगाह कर रहा हूं। <br /><br />मेरे इस मित्र ने अनलाईन विंडोज अपडेट करने का आप्शन आन कर रखा था। एक दिन अचानक उनके कम्प्यूटर पर एक तख्ती आ गई कि आपका Windows XP पाईरेटिड है। आप इसे इस्तेमाल नहीं कर सकते। साथ ही माऊस और कीबोर्ड भी जाम हो गए। <br /><br />बेचारे मित्र को मेकेनिक को बुलवा कर हार्ड डिस्क को पूरा साफ़ करवाना पड़ा और अपने सारे डाटा सामग्री से वंचित होना पड़ा।<div class="blogger-post-footer"><!-- Start Bravenet.com Service Code --> <script language="JavaScript" type="text/javascript" src="http://pub11.bravenet.com/counter/code.php?id=393917&usernum=928795354&cpv=2"> </script> <!-- END DO NOT MODIFY --></div>Jagdish Bhatiahttp://www.blogger.com/profile/17093503828934988942noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-25467648.post-1149218577658506562006-06-01T20:17:00.000-07:002007-04-05T11:00:58.532-07:00अनुगूँज 20: नेतागिरी, राजनीति और नेता<a href="http://www.akshargram.com/sarvagya/index.php/Anugunj"><img alt="Akshargram Anugunj" hspace="5" src="http://akshargram.com/images/anugunj.jpg" align="right" vspace="5" border="0" /></a><br /><br /><br /><br /><span style="font-size:130%;">नेता बनने का मुझे भी शॊंक चढ़ रहा था। मैने शुद्ध गाँधीवादी तरीका अपनाया देश और समाज की सेवा करने का। मैंने सोचा अपनी गली से ही शुरू करना चहिए। गली का सफ़ाई कर्मचारी तो कभी महीने में एक आध बार ही नजर आता है, सुबह सुबह मुँह अंधेरे एक बड़ा सा झाड़ू लिया और लग गया गली की सफ़ाई करने में । रात देर तक इटरनेट पर था। परिचर्चा में जीतु भाई ने बहस छेड़ी थी - ”मेरे सपनों का भारत” और घूमते घूमते बात पहुँच गई कि अच्छे लोग राजनीति में क्यों नही आते? हर कोई यह तर्क दे रहा था कि नेता बनना है तो गुंडागर्दी आनी चाहिए। मगर मेरा मानना है कि हमें एक इमानदार कोशिश करनी चाहिए - निस्वार्थ समाज सेवा। नेतागिरी, राजनीति और नेता तीनों की परिभाषा हमने ही तो बदलनी है।<br /><br />जैसे जैसे गली के लोग जागने लगे मुझे एहसास हुआ कि महिलाए मुझे देख कर मुहँ छिपा कर हँस रही हैं। धीरे धीरे बच्चों का एक समूह मेरे पीछे एकत्र हो गया। आते जाते लोग भी नजर घुमा कर देखते और मुस्कुरा कर आगे बढ़ जाते। तभी मेरी पत्नी आ गयीं और चिल्लायीं - ये क्या तमाशा लगा रखा है गली में? मैंने हकलाते हुए बोला- गली की सेवा कर रहा हूँ। घर में टीवी पर कितनी धूल जमी है, उसे तो साफ़ करने की कभी न सोची आपने। उसने अपनी काहिली भी मेरे ऊपर उड़ेल दी। मैं गली में खड़ा बहुत ही शर्मिंदगी महसूस कर रहा था, एसा लग रहा था कि मेरे पैरों के नीचे से किसी ने जमीन ही खींच ली हो।<br /><br />उठ कर दूध ले आईए वरना दूधवाले के पास समाप्त हो गया तो बिना चाय के ही आफ़िस जाना पडे़गा- फ़िर पत्नी की आवाज आई। मैं बदहवास सा उठ बैठा। बाप रे, कैसा भयावह सपना था।<br /><br /><br />मैं कीचड़ मे अपने पायजामे को संभालता चल रहा था। तीन दिन से लगातार रोज रात को बरसात हो रही थी । दूध वाले की डेयरी कालोनी के बीच में ही थी। भैंसों का गोबर बह कर नालिऒं मे रुकावट पैदा करता था जिस से जरा सी बरसात से गली में कीचड़ हो जाता था। पाँच सौ गज के प्लाट पर जबरन कब्जा कर के बनाई थी यह डेयरी। मगर दूध वाले लाला का कोई बाल भी बाँका नहीं कर सकता था। उसका बेटा देवा नेता था एरिया का। बहुत ही मुँह लगा था हमारे विधायक का। देवा का प्रापर्टी का धंधा है। टूटी फ़ूटी गली में सस्ता प्लाट खरीदते, दस बीस हजार विधाय्क जी को चड़ाते, बदले में गली की मरम्मत विधयक जी करवा देते। साफ़ गली में प्लाट डेढ़गुना दाम पर बिक जाता। सुना है कि देवा नगर निगम की टिकट की जुगाड़ में है।<br /><br />रात की बात अभी मेरे मन से गयी नहीं थी। कई विचार एक साथ आ जा रहे थे मन में।<br /><br />चलती गाड़ी से गोरा न होने की वजह से धकेले न गये होते तो क्या यह दुनिया वँचित हो जाती एक गाँधी जैसे नेता से?<br /><br />क्या आँदोलनों में तप कर ही असली नेता बनते हैं? आरक्षण के आँदोलन में खुद को जला कर मर गए राजीव गोस्वामी। नाम भी याद है किसी को?<br /><br />आज हमारे यहाँ, हिन्दुओं के नेता हैं, मुस्लामानों के नेता है, यादवों के नेता है, दलितों के नेता है। भारत का नेता कौन है?<br /><br />डेयरी में घुसा तो लाला रोज की तरह उर्दू का समाचार पत्र पढ़ रहे थे।<br /><br />राहुल के राजनीति में आने की बात पर मुहँ बना रहे थे लाला। कुछ और लोग भी खड़े थे दूध की इन्तजार में। राजनीति पर बहस चल रही थी। मैंने मन ही मन सोचा, राहुल गाँधी को तो साँसद हुए दो साल हो गए। माशा अल्ला अब तो बोल भी लेते हैं सँसद में। कुछ देर में अह्सास हुआ, बात राहुल महाजन की हो रही थी।<br /><br />"देश को युवा नेतृत्व की बहूत आवश्यकता है। चाहे राहुल महाजन हो या राहुल गाँधी। सचिन पायलट, ज्योतिरादित्य और अमर अब्दुला जैसों से बहुत उम्मीद है देश को"- बड़ी उम्मीद से बोल रहे थे एक बुजुर्ग।<br /><br />"मगर ये अर्जुन सिहँ जैसे जगह खाली करें तब ना"- लाला का नौकर दूध की बाल्टी रखते हुए कूद पड़ा था बहस में। लाला ने घूर कर देखा तो नौकर खिसक लिया।<br /><br />हमने भी फ़टाफ़ट दूध लिया और तेज कदमों से चल पड़े घर की और। आज फ़िर आफ़िस में देर हो जाएगी... . . . .<br /><br />नोट: यह एक कल्पनिक कथा है।<br /></span><a href="http://technorati.com/tag/anugunj" rel="tag">anugunj</a>, <a href="http://technorati.com/tag/अनुगूँज" rel="tag">अनुगूँज</a><div class="blogger-post-footer"><!-- Start Bravenet.com Service Code --> <script language="JavaScript" type="text/javascript" src="http://pub11.bravenet.com/counter/code.php?id=393917&usernum=928795354&cpv=2"> </script> <!-- END DO NOT MODIFY --></div>Jagdish Bhatiahttp://www.blogger.com/profile/17093503828934988942noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-25467648.post-1148999000867109432006-06-01T06:52:00.000-07:002006-06-01T21:13:28.933-07:00अनुगूँज 20: नेतागिरी, राजनीति और नेतातकनीकि कारणों से इस पोस्ट को दोबारा प्रकाशित कर दिया गया है।<div class="blogger-post-footer"><!-- Start Bravenet.com Service Code --> <script language="JavaScript" type="text/javascript" src="http://pub11.bravenet.com/counter/code.php?id=393917&usernum=928795354&cpv=2"> </script> <!-- END DO NOT MODIFY --></div>Jagdish Bhatiahttp://www.blogger.com/profile/17093503828934988942noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-25467648.post-1148733280792742282006-05-27T09:23:00.000-07:002007-04-05T11:03:27.516-07:00क्या चीँटे की जान<span style="font-size:130%;">आज सुबह सुबह शेव करते हुए अचानक वाश बेसिन में देखा, एक काला मोटा चीँटा घूम रहा था। इस डर से कि अभी बच्चे ब्रश करने आएंगे तो कहीं चींटा उन्हे काट न ले, मैने शेव के मग्गे का पूरा पानी चीँटे पर उढ़ेल दिया। मैंने सोचा चीँटा बह जाएगा। मगर थोड़ी देर में देखा, चीँटा फ़िर वाश बेसिन के छेद से निकल कर वाश बेसिन मे घूमने लगा। मैने दोबारा और फ़िर तिबारा पानी का भरा मग्गा उस पर उढ़ेल दिया, मगर हर बार वह विजयी हो कर छेद से वापिस निकल आता।<br /><br />आज पूरा दिन वह मोटा, काला चीँटा बार बार धीरे धीरे वाश बेसिन पर चढ़्ता, मेरी आँखों के आगे घूमता रहा।<br /><br />क्या तो चीँटे का शरीर और क्या चीँटे की जान, मगर वो हारा नहीं। कमजोर नहीं हुआ मुश्किलों के आगे।<br /><br />एक हम इंसान हैं!<br /><br />ताकतवर शरीर, तेज बुद्धी, हर प्रकार की सुविधा, मगर जिंदगी कि छोटी छोटी परेशानियों से कैसे घबरा जाते हैं।<br /></span><br />अभी कल ही की बात है दिल्ली पब्लिक स्कूल की एक छात्रा ने कम नंबर आने पर आत्महत्या कर ली।<div class="blogger-post-footer"><!-- Start Bravenet.com Service Code --> <script language="JavaScript" type="text/javascript" src="http://pub11.bravenet.com/counter/code.php?id=393917&usernum=928795354&cpv=2"> </script> <!-- END DO NOT MODIFY --></div>Jagdish Bhatiahttp://www.blogger.com/profile/17093503828934988942noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-25467648.post-1148401506504547032006-05-23T09:25:00.000-07:002006-05-23T09:32:38.116-07:00पप्पू पास हो गयाआज बाहरवीं के नतीजे आ गये। हमारे समाज में बाहरवीं की परिक्षा इतनी महत्वपूर्ण कर दी गईं हैं छात्रों के लिये कि जब तक ९०% से अधिक नंबर नहीं आते, न तो मन पसन्द कोर्स ही मिलता है और न ही मन पसन्द कालेज। मजबूरी और निराशा में करो बी ए पास। <br />कभी सोचा है- अभी जिन्दगी ठीक से शुरू भी नहीं हो पाती और एक गहरी निराशा भर जाती है मन में।<br />लगता है हमारे समाज में दिखने वाली निराशा और उत्साह की कमी के पीछे हमारी शिक्षा व्यवस्था की कमियां ही हैं।<div class="blogger-post-footer"><!-- Start Bravenet.com Service Code --> <script language="JavaScript" type="text/javascript" src="http://pub11.bravenet.com/counter/code.php?id=393917&usernum=928795354&cpv=2"> </script> <!-- END DO NOT MODIFY --></div>Jagdish Bhatiahttp://www.blogger.com/profile/17093503828934988942noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-25467648.post-1148280555149001222006-05-21T23:41:00.000-07:002006-05-21T23:49:15.160-07:00चाँदनी चौक मेंगृह कलेश, दुर्भाग्य दूर करने के लिये और सुख शांति के लिये - टोने टोटके<br />जी नहीं, ये में किसी चाँदनी चौक के सार्वजनिक सुविधाओं वाले स्थान पर पाये जाने वाले इस प्रकार के पोस्टरों की बात नहीं कर रहा, ये शीर्षक हैं आजकल नारद के RSS feed पर कुछ नई पोस्टों के।<br />अगर किसी के पास हो तो कोई नींबू और मिर्ची के फ़ोटो हमें भी ईमेल कर दो भाई, अपने ब्लाग पर लगाऊंगा, कहीं नजर न लग जाए।<div class="blogger-post-footer"><!-- Start Bravenet.com Service Code --> <script language="JavaScript" type="text/javascript" src="http://pub11.bravenet.com/counter/code.php?id=393917&usernum=928795354&cpv=2"> </script> <!-- END DO NOT MODIFY --></div>Jagdish Bhatiahttp://www.blogger.com/profile/17093503828934988942noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-25467648.post-1147615979773937052006-05-14T07:12:00.000-07:002007-04-05T11:02:03.894-07:00दस रुपये दो न माँ<span style="font-size:130%;">मेरा बाहरवीं का रिज्ल्ट आया था उस दिन। बहुत अच्छे नंबर आये थे। क्लास में टॉप किया था। मैं बहुत खुश था। में पल भर के लिये घर में क्या चल रहा है यह भी भूल गया था।<br />स्कूल से आया तो मेरे पास होने का गली में शोर सा मच गया। घर में जैसे ही घुसा तो एकदम ठिठक सा गया।<br /><br />माँ बहुत बीमार चल रहीं थीं।<br />थोड़ी देर में माँ ने बुलाया, तकिए के नीचे से दस रुपये निकाल कर दिये।<br />कुछ बोल न पाईं।<br />इसके दो दिन बाद ही वो चल बसीं।<br />आज मातृ दिवस पर वो दस रूपये मिल नहीं रहे, जाने कहाँ रख दिये।<br /><br />दस रुपये दो न माँ !!!!</span><div class="blogger-post-footer"><!-- Start Bravenet.com Service Code --> <script language="JavaScript" type="text/javascript" src="http://pub11.bravenet.com/counter/code.php?id=393917&usernum=928795354&cpv=2"> </script> <!-- END DO NOT MODIFY --></div>Jagdish Bhatiahttp://www.blogger.com/profile/17093503828934988942noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-25467648.post-1147580310019902952006-05-13T21:18:00.000-07:002006-05-13T21:25:16.843-07:00एक नया मंच "परिचर्चा"सजाल पर हिन्दी व इस से संबधित विषयों व अन्य रोचक विषयों पर हिन्दी में चर्चा के लिए एक <a href="http://akshargram.com/paricharcha">परिचर्चा </a>एक नया सजाल है। यहाँ पर हिन्दी में शुभारंभ, ब्लॉगजगत, व वादविवाद जैसे मंच हैं जिन में आप के जैसे ही हिन्दी प्रेमी भाग ले रहें हैं। आप भी इस के सदस्य बनिए व इन विषयों पर चर्चा आरंभ करें। तो आइए चर्चा करें।<br /><br /><a href="http://technorati.com/tag/परिचर्चा" rel="tag">परिचर्चा</a><div class="blogger-post-footer"><!-- Start Bravenet.com Service Code --> <script language="JavaScript" type="text/javascript" src="http://pub11.bravenet.com/counter/code.php?id=393917&usernum=928795354&cpv=2"> </script> <!-- END DO NOT MODIFY --></div>Jagdish Bhatiahttp://www.blogger.com/profile/17093503828934988942noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-25467648.post-1146818280349123222006-05-05T01:38:00.000-07:002006-05-05T01:38:00.386-07:00चौटाला की रोटी<a href="http://www.bbc.co.uk/hindi/regionalnews/story/2006/05/060505_chautala_asset.shtml">'चौटाला परिवार की संपत्ति 1467 करोड़' </a><br />खाते तो आटे की ही रोटी होंगे। नहीं?<div class="blogger-post-footer"><!-- Start Bravenet.com Service Code --> <script language="JavaScript" type="text/javascript" src="http://pub11.bravenet.com/counter/code.php?id=393917&usernum=928795354&cpv=2"> </script> <!-- END DO NOT MODIFY --></div>Jagdish Bhatiahttp://www.blogger.com/profile/17093503828934988942noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-25467648.post-1146111650283903842006-04-26T21:20:00.000-07:002006-04-26T21:20:50.330-07:00वर्ल्ड सिटी दिल्लीदिल्ली में कॉमनवेल्थ गेम हो रहे है<br /> मेलबर्न में शीला दीक्षित पूरे लाव लश्कर के साथ पँहुचीं,<br />एश्वर्या के लटके झटके दिखाए पूरी दुनिया को,<br />गुलज़ार साहब से "दिल्ली चलो" का गान लिखवाया,<br />सच बताएं हमें भी बहुत अच्छा लगा टीवी पर देख कर।<br />यहां टाईम्स ऑफ इंडिया ने चलो दिल्ली अभियान चलाया<br />दिल्ली को Walled City to World City बनाने के लिए।<br />जमीनी हकीकत यह है कि दिन में आठ से दस घंटे बिजली गायब रहती है और पानी की कमी इतनी कि कभी कभी नहाने का इंतजाम मुश्किल हो जाता है।<div class="blogger-post-footer"><!-- Start Bravenet.com Service Code --> <script language="JavaScript" type="text/javascript" src="http://pub11.bravenet.com/counter/code.php?id=393917&usernum=928795354&cpv=2"> </script> <!-- END DO NOT MODIFY --></div>Jagdish Bhatiahttp://www.blogger.com/profile/17093503828934988942noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-25467648.post-1145632843750828092006-04-21T08:20:00.000-07:002006-04-21T08:20:43.776-07:00कैसे कैसे भगवानअभी कुछ वर्ष पहले जब कन्नड़ अभिनेता राजकुमार का वीरअप्पन ने अपहरण कर लिया था तो उनके किसी भक्त ने हिम्मत न दिखाई? अरे जंगल में जा कर भिड़ जाते वीरअप्पन से। अब मर गए तो बंद पड़ी दुकानों को जला रहे हैं, ऐसी तो थोथि आस्थाएं हैं हमारी।<br /><br />ऐसे बहुत से पात्र हमें मिल जाएंगे जिन्हे हमने भगवान बना कर पूजा और समय की धूल में भुला दिया। इनमें से कुछ का जिक्र मैंने अपने पिछले ब्लाग में किया है। मगर यहाँ मैं एक काल्पनिक पात्र के बारे में लिखना चाहता हूं। कुछ साल पहले स्टार प्लस पर एक सीरियल शुरू हुआ ”क्यूंकि सास भी कभी बहू थी", सीरियल का एक पात्र मिहिर मर गया, घरों में महिलाएं बिलख बिलख कर रोईं। समाचार पत्रों में भी मिहिर के मरने का समाचार छपा। आस्था देखिए कि आज भी इस सीरियल को नियमित देखा जाता है।<br /><br />गणेषजी के दूध पीने का किस्सा तो सब को मालूम ही है।<br /><br />दिल्ली में एक अफवाह फ़ैली कि एक बंदर सा दिखने वाला इंसान रात में छुप कर हमला करता है। सच मानिए न कोई घायल हुआ और न ही कोई यह कहने के लिए सामने आया कि हाँ मैने उसे देखा है, मगर पूरी पूरी कालोनियों के लोग रात रात भर जागकर पहरा देने लगे। अपने न्यूज़ चैनलों वाले भी सारी सारी रात कैमरा ले कर ढूंढते रहे उस बंदर को।<br /><br />अंधी आस्थाएँ हैं हमारी, कोई तर्क मत पूछना।<br /><blockquote></blockquote><div class="blogger-post-footer"><!-- Start Bravenet.com Service Code --> <script language="JavaScript" type="text/javascript" src="http://pub11.bravenet.com/counter/code.php?id=393917&usernum=928795354&cpv=2"> </script> <!-- END DO NOT MODIFY --></div>Jagdish Bhatiahttp://www.blogger.com/profile/17093503828934988942noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-25467648.post-1145283245633173952006-04-17T07:07:00.000-07:002006-04-17T08:12:52.790-07:00एक अदद भगवान की जरूरत हैहमारा समाज नित नए भगवान गड़ता रहता है. हमारे यहां सब से ज्यादा देवी देवता हैं. हमारे देश में सांप से लेकर नदियों तक और सूरज से लेकर अमिताभ बच्चन तक की पूजा होती है. फिर भी हम नये नये भगवान बनाने की कोशिश करते रहते हैं.<br /><br />“क्रिकेट हमारा धर्म है और सचिन हमारा भगवान” का उद्घोष करने वाला हमारा समाज क्यों नये नये हीरो बनाता है, उनकी अंधी भक्ती करता है फिर भूल जाता है कि वे भी एक इन्सान हैं एकदम हमारे माफिक. और फिर वही सचिन ज़रा आऊट आफ फारम हुआ कि उसे हूट करने लगते हैं.<br /><br />क्या चाहते हैं हम? किसे खोज रहे हैं? क्या एसा तो नहीं है कि हमारे मनों में एक कमतरी का एहसास है और हम हमेशा यही सोचते हैं कि कभी कोइ दूसरा आएगा और सूपरमैन की तरह हमारे दुख तकलीफों को दूर करेगा. क्यों हम भीतर से शबरी और भीलनी बने किसी राम का इन्तजार करते रहते हैं? क्या इसी मानसिकता के कारण हमने अंग्रेजों को अपना माईबाप बना लिया था?<br /><br />आज का समाचार पत्र मेरे सामने पड़ा है और मुख पृष्ठ पर धोनी छाए हुए हैं, लीजिए एक और भगवान बनने को है. कल से ये बताएंगे हमें कौन से साबुन से नहाना चाहिए या कौनसे टूथपेस्ट, शैंम्पू या कपड़े इस्तेमाल करने चाहिएं.<br /><br />फिर हम अपने भगवानों के लिए मरने मारने पर उतारू हो जाते हैं. रामदेव को वृंदा करात ने कुछ कह दिया तो हर शहर में वृंदा करात के पुतले जलाए गये. दक्षिण में राजकुमार मर गए तो शहर में दंगा हो गया. आस्था में अंधे होकर हम तर्क वितर्क भी भूल जाते हैं.<br /><br />अगली बार लिखुंगा : कैसे कैसे भगवान और कैसी कैसी आस्थाएं<br /><a href="http://technorati.com/tag/%E0%A4%85%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%87%E0%A4%A3%E0%A5%80%E0%A4%AC%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7" rel="tag">अश्रेणीबद्ध</a><div class="blogger-post-footer"><!-- Start Bravenet.com Service Code --> <script language="JavaScript" type="text/javascript" src="http://pub11.bravenet.com/counter/code.php?id=393917&usernum=928795354&cpv=2"> </script> <!-- END DO NOT MODIFY --></div>Jagdish Bhatiahttp://www.blogger.com/profile/17093503828934988942noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-25467648.post-1144386515089290732006-04-06T21:57:00.000-07:002006-04-06T22:08:35.100-07:00गुजरात मेंये वेबसाईट वाले भी कैसे कैसे समाचार जोङ देते हैं. bbchindi.com पर आज की सुर्खियां हैं<br />आडवानी की रथ यात्रा शुरू.<br />गुजरात में भुकंप के हल्के झटके.<div class="blogger-post-footer"><!-- Start Bravenet.com Service Code --> <script language="JavaScript" type="text/javascript" src="http://pub11.bravenet.com/counter/code.php?id=393917&usernum=928795354&cpv=2"> </script> <!-- END DO NOT MODIFY --></div>Jagdish Bhatiahttp://www.blogger.com/profile/17093503828934988942noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-25467648.post-1144334943868439872006-04-06T07:42:00.000-07:002006-04-06T07:49:03.876-07:00बिस्कुटों वाली बुआ1968-69 की बातहै, मैं तीन या चार साल का रहा होंऊगा. अस्सी साल की वो बुङिया हमारे सामने के घर में रहती थी. कंकाल सी काया थोङी झुकी हुई, बेतरतीब से सफेद चांदी बाल. थोङा तुतलाते हुए पंजाबी बोला करतीं. सब उसे बिस्कुटों वाली बुआ कह कर बुलाते थे. एक आना यानी छह पैसे के दो बिस्कुट बेचा करतीं थी. मगर अब पाँच पैसे और दस पैसे चल पङे थे. मैं हमेशा पाँच पैसे के दो बिस्कुट ले आता था मगर वो एक पैसा फिर दे जाना कहना नहीं भूलती थीं.<br /><br />मैं कभी कभी उसके पास ही सो जाया करता था. बाद में माँ उठा लातीं थीं उसके पास से. मुझे इसकी आदत ही हो गई. एक बार जब मैं माँ के साथ रोहतक मामा के घर गया तो रोने ही लगा, मुझे तो बिस्कुटों वाली बुआ के पास ही सोना था.<br /><br /> बिस्कुटों वाली बुआ जब गईं तो वो मेरा पहला अनुभव था मौत के साथ. मैं खङा रहा उसके कमरे के दरवाजे पर, उसे नीचे लिटा दिया गया था जमीन पर. सब कहते इस बच्चे को हटाओ कहीं डर ही न जाए मगर मैं वहीं टिका रहा कि अचानक उनकी बेटी जो शायद अमृतसर से आईं थीं जोर जोर से रोने लगीं. मैं शायद बहुत ज्यादा कुछ समझ न पाया था कि क्या हो रहा है!!!!!!!!!!!!!<div class="blogger-post-footer"><!-- Start Bravenet.com Service Code --> <script language="JavaScript" type="text/javascript" src="http://pub11.bravenet.com/counter/code.php?id=393917&usernum=928795354&cpv=2"> </script> <!-- END DO NOT MODIFY --></div>Jagdish Bhatiahttp://www.blogger.com/profile/17093503828934988942noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-25467648.post-1144254769379893272006-04-05T08:28:00.000-07:002006-04-06T04:25:09.846-07:00जब प्राण तन से निकले<a href="http://photos1.blogger.com/blogger/1365/2661/1600/38169192.0.jpg"><img style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; CURSOR: hand; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://photos1.blogger.com/blogger/1365/2661/320/38169192.0.jpg" border="0" /></a><br />जब सिंधु ने यह पूछा कि आप ने कभी मौत के बारे में सोचा है तो मैं हैरान रह गया. मैंने अपनी जिंदगी में कितनी ही मौतें देखीं मगर कभी अपने लिए एसा नहीं सोचा. इतने साल हो गये बीमा बेचते मगर कभी किसी को मौत के बारे में नहीं याद कराया.<br /><br />मगर वो बङी मासूमियत से पूछती है आपने वो भजन नहीं सुना<br /><br /><span style="color:#ffff99;"><strong>इतना तो करना स्वामि जब प्राण तन से निकले<br />गोबिंद नाम लेके जब प्राण तन से निकले.<br /></strong><br /></span>उसे तो मैंने डांट ही दिया, एसा नहीं सोचते. मगर मैं खुद सोचता रहा सारा दिन. बचपन की वो बुङिया पङोसिन की मौत से लेकर दो साल पहले पिताजी का जाना एक एक कर सब दौङ गया दिमाग के परदे पर. सोचता हूं सब कुछ लिख डालूं. पता नहीं ब्लाग शुरू करने का यह तरीका ठीक है कि नहीं.<div class="blogger-post-footer"><!-- Start Bravenet.com Service Code --> <script language="JavaScript" type="text/javascript" src="http://pub11.bravenet.com/counter/code.php?id=393917&usernum=928795354&cpv=2"> </script> <!-- END DO NOT MODIFY --></div>Jagdish Bhatiahttp://www.blogger.com/profile/17093503828934988942noreply@blogger.com