Wednesday, June 28, 2006

कृष्णा टु सुदामा "थैंक्यू बड्डी, वैरी टेस्टी सत्तू"-२

अमित जी ने मेरी पिछली पोस्ट कृष्णा टु सुदामा "थैंक्यू बड्डी, वैरी टेस्टी सत्तू" के जवाब में एक किस्सा दिया है कि किस प्रकार महिलाओं को बस में सीट देने के बाद आभार तक व्यक्त नहीं करतीं। अमित जी लिखते हैं


"पर बीते ज़माने की किसी महिला को यदि सीट दी जाती, तो आभार प्रकट करना तो
दूर, वे तो बैठती भी ऐसे अकड़ के कि जैसे सीट दहेज में मायके से लाईं हों
जिस पर उनका सर्वस्व अधिकार है!! होता तो कुछ नहीं पर ऐसी महिलाओं से बड़ी
कोफ़्त होती कि एक तो इतना थका मांदा होने के बाद भी सीट दी और ऐसे ऐंठ के
साथ उस पर बैठीं कि जैसे उन्होंने एहसान किया बैठ कर!!"


एक किस्सा मैं भी सुनाता हूं आपको


कई साल पहले की बात है एक बार मैं शाम के समय ट्रेन से दिल्ली से रोहतक जा रहा था। साथ की सीट पर एक युवक सांध्य टाईम्स (दिल्ली में मिलने वाला एक सांध्य दैनिक) पढ़ रहा था। पढ़ते पढ़ते जब उसने पन्ना पलटा तो एक समाचार पर मेरी नजर गई "सुनील दत्त अस्पताल में" मैने कोतुहल से पूछ लिया "क्या हो गया सुनील दत्त साहब को? " पता है क्या जवाब मिला "मैं के डाक्टर लग रया हूं?"


इस प्रकार के कई किस्से आप ने भी सुने होंगे। आपके द्वारा और मेरे द्वारा दिये गये इन किस्सों से यह तो स्पष्ट हो गया कि हम दोनो मानते हैं कि हमारे समाज का एक चरित्र यह भी है। अब आप बताईये जो बंदा सीधी सी बात का सीधा सा जवाब भी नहीं देता उस से थैंक्यू की उम्मीद कैसे कर सकता हूं। जो महिला ऎंठ के साथ यूं बैठे जैसे एहसान कर दिया उस से आप धन्यवाद की उम्मीद कैसे कर सकते हैं?


मगर हमारे महानगरों में जहां अभिजात वर्ग है वहां थैंक्यू और सॉरी की औपचारिकताएं बहुत हद तक निभाई जातीं हैं इस में कोई दो राय नहीं है।

मैं तो इस से आगे बढ़ कर कह रहा हूं कि उन्हें मुंबई में ही अशिष्ट्ता दिख गई जहां व्यापक रूप से शिष्ट अभिजात्य वर्ग रहता है, हमारे देहात तो देखे ही नहीं। रीडर्स डाइजेस्ट वालों को हो सकता है कि हमारी लट्ठ्मार होली देख कर उस में भी हिंसा नजर आ जाए मगर उसमें छिपे प्यार को तो एक भारतीय ही समझ सकता है ना।


उपरोक्त कथा में जो एक हरयाणवी चरित्र नजर आता है उसे तो सिर्फ़ आप और हम ही समझ सकते हैं कोई विदेशी नहीं। हमारे पंजाब में माएं अपने बच्चों को बहुत प्यार से "मोया" (dead) कह कर बुलातीं हैं, मां के इस प्यार को एक पंजाबी ही समझ सकता है, इसे समझने के लिये हमें किसी विदेशी चश्मे की जरूरत नहीं है।


मुझे अपने समाज के इस चरित्र से कोई शिकायत नहीं है, इससे पलट मुझे यह चरित्र बहुत भाता है।


यहा कृष्ण को अपने सुदामा के सत्तू अभी भी उतने ही स्वादिष्ट लगते हैं।


Tuesday, June 27, 2006

कृष्णा टु सुदामा "थैंक्यू बड्डी, वैरी टेस्टी सत्तू"


रीडर्स डाइजेस्ट पत्रिका ने मुंबई को अशिष्ट नागरिको का शहर बताया है।


अपने चिट्ठाकारों ने इतना कुछ लिख दिया इस विषय पर कि पिछली अनुगूंज पर भी इतना नहीं लिखा।


मेरा मानना यह है कि इस प्रकार के सर्वे वैज्ञानिक तरीके से नहीं कराए जाते इसलिए यह विश्वसनीय नहीं होते।
जब चुनाव के वक्त हमारे यहां सभी न्यूज चैनल वैज्ञानिक(?) तरीके से सर्वे कराते हैं तो भी ज्यादातर सर्वे गलत निकल आते हैं। रीडर डाईजेस्ट वालों को मुंबई के ग्राहक चाहिएं तो मुंबई की बात करते हैं, कभी हमारे गांव देहात की लट्ठमार होली और लट्ठमार बोली देखी नहीं उन्होने।


बात बात पर सॉरी या थैंक्यू कहने का रिवाज हमारे यहां वैसे भी नहीं है और हम इसे अशिष्टता नहीं मानते।


किसी समाज का मर्म उस समाज में रहने वाले ही जानते हैं, औपचारिकताओं में जीने वाला समाज नहीं है हमारा। कोई दोस्त जब बहुत दिनों के बाद मिले तो झट जा कर गले मिलने का रिवाज है हमारे यहां। मिलने से पहले यह नहीं सोचते कि गर्मी में आया है, पसीने आ रहे हैं और शरीर से दुर्गंध न आती हो।


कृष्ण के घर सुदामा आए तो झट भाग कर गये और गले लगा लिया, मैले कपड़े नहीं देखे। प्रोटोकोल भी नहीं सोचा। सत्तू छीन कर खा लिये। क्या कृष्ण भगवान ने थैंक्यू कहा होगा सत्तू के लिये। "थैंक्यू बड्डी, वैरी टेस्टी सत्तू"। खींच कर अपने पास बिठा लिया, सैकरेटरी से नहीं कहा की जा कर स्वागत करॊ और मेहमानों के कमरे में ठहरा दो।


यह कृष्ण सुदामा हमारे समाज में अभी भी हैं। इन गोरे लोगों को क्या समझ।


Sunday, June 25, 2006

बालमन पर इमरजेंसी का डर

आज नीरज भाई ने लिखा तो मुझे भी आपतकाल का एक किस्सा याद आ गया। मैं दस साल का था, छठी कक्षा में पढ़ता था। इतनी राजनैतिक या सामाजिक समझ तो नहीं आई थी मगर यह पता था कि सरकार ने कुछ नियंत्रण लागू किये हैं आम लोगों पर। इमरजेंसी की इतनी समझ थी कि एक दिन आधी छुट्टी के समय स्कूल के मैदान में घूमते हुए जब सूर्यदेव बादल से घिर गए तो अपने सहपाठी से मैंने कहा था "लगता है सूरज को भी इमर्जेंसी लग गई है"।


अफ़वाहों का बाजार गरम रहता था और लोगों में सब से ज्यादा भय था जबरन नसबंदी को ले कर।


एक दिन सरकारी टीकाकरण अभियान के अंतर्गत हमारे स्कूल में बच्चों को टीके लगाये जाने थे कि स्कूल में अफ़वाह उड़ी कि बच्चों को नसबंदी के टीके लगाये जा रहे हैं। सुनने में आया कि जिस भी बच्चे को यह टीका लगेगा बड़े होने पर उसके बच्चे नहीं हो पाएंगे। आप समझ सकते हैं कि बाल मन पर इसका कैसा प्रभाव हुआ होगा। एक एक दो दो कर के बच्चे खिसकने लगे घर की ओर। टीचर भी बहुत कम नजर आ रहे थे स्कूल में। आधी छुट्टी तक लगभग सारा स्कूल खाली हो चुका था। मैं भी बस्ता उठा भाग खड़ा हुआ घर की ओर। गेट पर चौकीदार भी नदारद था उस दिन। रास्ते में डरता रहा कि जल्दी घर आने का क्या कारण दूंगा घर पहूंच कर। मगर मुझसे पहले महल्ले के जो बड़े बच्चे स्कूल से घर गए थे शायद उनसे पूरी बात का पता चल गया था सो न तो घर वालों ने कुछ पूछा और न ही मैंने बताया।

Sunday, June 18, 2006

संवेदनशील बच्चे


बच्चे बहुत संवेदनशील होते हैं। उनकी आवश्यकताएं भौतिक कम और भावनात्मक ज्यादा होती हैं।


भावनात्मक इस लिये क्योंकि आजकी भागती दौड़ती दुनिया में हर पिता का ज्यादा जोर अपने बच्चों की भौतिक आवशकताओं को पूरा करने में रहता है। कहीं ऐसा तो नहीं कि हम केवल अच्छे कपड़े, घर पर बच्चों के लिये कंप्यूटर, अच्छे स्कूल, महीने में एक या दो बार घर से बाहर खाना और जेब खर्च दे कर यह सोच लेते हैं कि हम अपना धर्म बहुत अच्छी तरह निभा रहे हैं। सप्ताह में छ्ह दिन काम में व्यस्त और इतवार को पूरा दिन सो कर थकान मिटाओ।


क्या बच्चों को अपने पिता के साथ बिताने के लिये बेहतर खुशनुमा समय मिल पाता है? क्या हमारे बच्चे हमें अपना सबसे अच्छा दोस्त समझते हैं? क्या हमारे बच्चे अपने मन में उठी हर नई भावना हम से सहजता से बांट सकते हैं? क्या बच्चे में यह विश्वास है कि जब भी उसे कोई परेशानी होगी तो मेरे पिता मेरे लिये सब ठीक कर देंगे।


Saturday, June 17, 2006

अपने प्यारे पापा को

कल फ़ादर डे पर


सुबह सुबह ऑफ़िस जाते हुए


अपने प्यारे पापा को जब मैं ग्रीटिंग कार्ड दूंगी


थैंक्यू बेटे कह कर वे मुस्कुराएंगे


मगर हल्के से जरूर झेंप जाएंगे।


दो बातें भी नहीं कर पाएंगे


ऑफ़िस को देर हो जाएगी।


शाम को काम से फ़िर देर से आएंगे।


बहुत ही अच्छे हैं मेरे पापा,


जो भी मांगो ले कर देते हैं।


मगर अक्सर कंप्यूटर पर गेम्स खेलते हुए सोचती हूं


काश कभी हम अपने पापा के साथ अंत्याक्षरी खेल पाते......



Tuesday, June 13, 2006

दिस इज़ हिंडी न्यूजपेपर फ़्रॉम डेल्ही

आज नवभारतटाईम्स के दिल्ली संस्करण के कुछ समाचार:


(यह तो मात्र एक उदाहरण है, आप किसी भी दिन का अंक देखिए, समाचार ऎसे ही मिलेंगे)


१.डीयू के स्कूल ऑफ़ ओपन लर्निंग में प्रफ़ेशनल कोर्स नहीं


२. एडमिशन फ़ॉर्म जमा कराने 10 हजार स्टूडेंट्स पहुंचे


३. डीयू में पीजी लेवल के 4 नए फार्मा कोर्स


४. कड़कड़डूमा में पार्किंग की टेंशन होगी खत्म


५.नोएडा में बिना एनओसी के चल रही है इंडस्ट्रीज


६. बढ़ रहा है नए फ़ीचर वाले मोबाईलों का क्रेज


संपादकीय भी एसी ही भाषा में है, पूरा संपादकीय न दे कर इंगलिश के प्रयुक्त शब्द यहां दे रहा हू:


पब्लिक, पॉलिटिक्स, सेंट्रल गवर्नमेंट, फेवर, परसेंट, सेक्टर, डिक्लेयर्ड, विलेन, डायबटीज।

Saturday, June 10, 2006

आपके ब्लाग पर मेरा फ़ोटो तो नहीं?

समीर भाई ने अपनी पोस्ट अपना ब्लाग बेचो, भाई......... में छाया जी को लिखा कि "जरा फ़ोटू वगेरह लगाओ और वो भी नाम भी साथ मे.कैसी भी फोटो हो, लगा दो" तो हमें भी जोश आ गया और अपना फ़ोटो लगा दिया अपने ब्लाग पर। याहू ३६० पर अपना ब्लाग तो बना रखा था जिस पर कभी लिखना शुरू नहीं किया था वहाँ के प्रोफ़ाईल पर भी फ़ोटो चिपका दिया। यहाँ आपको बता दें कि फ़ोटॊ लगाने से पहले हमारे मन में कई प्रकार के विचार आए। हमने सुन रखा था कि इटरनेट पर कई लोग फ़ोटो का दुरुपयोग भी कर लेते हैं। फ़िर सोचा हम कोई जान ईब्राहिम तो है नहीं जिसकी फ़ोटो कापी कर के लोग अपने पास सेव कर लेंगे और बेधड़क हो के लगा दिया अपना फ़ोटो।



हैरानी तो आज तब हुई जब एक बंदे Psycho Nathan का ईमेल आया जो मुझे अपने ३६० याहू पर अपना दोस्त बनाना चहता था। अब जब इस बंदे के ब्लाग पर जब गया तो देखता क्या हूं कि उसने अपने प्रोफ़ाईल में अपनी जगह मेरी फ़ोटो लगा रखी थी। अब हालत यह है कि मैंने अपने ब्लाग से अपनी फ़ोटो हटा ली है मगर मेरी फ़ोटो उसके ब्लाग पर लगी हुई है। कोई बताए इसका कोई हल है?

Wednesday, June 07, 2006

Windows XP इस्तेमाल करने वालों के लिए

मेरे एक मित्र जो Windows XP इस्तेमाल करते हैं के साथ यह खतरनाक हादसा हुआ। यहां बता कर आप सब को आगाह कर रहा हूं।

मेरे इस मित्र ने अनलाईन विंडोज अपडेट करने का आप्शन आन कर रखा था। एक दिन अचानक उनके कम्प्यूटर पर एक तख्ती आ गई कि आपका Windows XP पाईरेटिड है। आप इसे इस्तेमाल नहीं कर सकते। साथ ही माऊस और कीबोर्ड भी जाम हो गए।

बेचारे मित्र को मेकेनिक को बुलवा कर हार्ड डिस्क को पूरा साफ़ करवाना पड़ा और अपने सारे डाटा सामग्री से वंचित होना पड़ा।

Thursday, June 01, 2006

अनुगूँज 20: नेतागिरी, राजनीति और नेता

Akshargram Anugunj



नेता बनने का मुझे भी शॊंक चढ़ रहा था। मैने शुद्ध गाँधीवादी तरीका अपनाया देश और समाज की सेवा करने का। मैंने सोचा अपनी गली से ही शुरू करना चहिए। गली का सफ़ाई कर्मचारी तो कभी महीने में एक आध बार ही नजर आता है, सुबह सुबह मुँह अंधेरे एक बड़ा सा झाड़ू लिया और लग गया गली की सफ़ाई करने में । रात देर तक इटरनेट पर था। परिचर्चा में जीतु भाई ने बहस छेड़ी थी - ”मेरे सपनों का भारत” और घूमते घूमते बात पहुँच गई कि अच्छे लोग राजनीति में क्यों नही आते? हर कोई यह तर्क दे रहा था कि नेता बनना है तो गुंडागर्दी आनी चाहिए। मगर मेरा मानना है कि हमें एक इमानदार कोशिश करनी चाहिए - निस्वार्थ समाज सेवा। नेतागिरी, राजनीति और नेता तीनों की परिभाषा हमने ही तो बदलनी है।

जैसे जैसे गली के लोग जागने लगे मुझे एहसास हुआ कि महिलाए मुझे देख कर मुहँ छिपा कर हँस रही हैं। धीरे धीरे बच्चों का एक समूह मेरे पीछे एकत्र हो गया। आते जाते लोग भी नजर घुमा कर देखते और मुस्कुरा कर आगे बढ़ जाते। तभी मेरी पत्नी आ गयीं और चिल्लायीं - ये क्या तमाशा लगा रखा है गली में? मैंने हकलाते हुए बोला- गली की सेवा कर रहा हूँ। घर में टीवी पर कितनी धूल जमी है, उसे तो साफ़ करने की कभी न सोची आपने। उसने अपनी काहिली भी मेरे ऊपर उड़ेल दी। मैं गली में खड़ा बहुत ही शर्मिंदगी महसूस कर रहा था, एसा लग रहा था कि मेरे पैरों के नीचे से किसी ने जमीन ही खींच ली हो।

उठ कर दूध ले आईए वरना दूधवाले के पास समाप्त हो गया तो बिना चाय के ही आफ़िस जाना पडे़गा- फ़िर पत्नी की आवाज आई। मैं बदहवास सा उठ बैठा। बाप रे, कैसा भयावह सपना था।


मैं कीचड़ मे अपने पायजामे को संभालता चल रहा था। तीन दिन से लगातार रोज रात को बरसात हो रही थी । दूध वाले की डेयरी कालोनी के बीच में ही थी। भैंसों का गोबर बह कर नालिऒं मे रुकावट पैदा करता था जिस से जरा सी बरसात से गली में कीचड़ हो जाता था। पाँच सौ गज के प्लाट पर जबरन कब्जा कर के बनाई थी यह डेयरी। मगर दूध वाले लाला का कोई बाल भी बाँका नहीं कर सकता था। उसका बेटा देवा नेता था एरिया का। बहुत ही मुँह लगा था हमारे विधायक का। देवा का प्रापर्टी का धंधा है। टूटी फ़ूटी गली में सस्ता प्लाट खरीदते, दस बीस हजार विधाय्क जी को चड़ाते, बदले में गली की मरम्मत विधयक जी करवा देते। साफ़ गली में प्लाट डेढ़गुना दाम पर बिक जाता। सुना है कि देवा नगर निगम की टिकट की जुगाड़ में है।

रात की बात अभी मेरे मन से गयी नहीं थी। कई विचार एक साथ आ जा रहे थे मन में।

चलती गाड़ी से गोरा न होने की वजह से धकेले न गये होते तो क्या यह दुनिया वँचित हो जाती एक गाँधी जैसे नेता से?

क्या आँदोलनों में तप कर ही असली नेता बनते हैं? आरक्षण के आँदोलन में खुद को जला कर मर गए राजीव गोस्वामी। नाम भी याद है किसी को?

आज हमारे यहाँ, हिन्दुओं के नेता हैं, मुस्लामानों के नेता है, यादवों के नेता है, दलितों के नेता है। भारत का नेता कौन है?

डेयरी में घुसा तो लाला रोज की तरह उर्दू का समाचार पत्र पढ़ रहे थे।

राहुल के राजनीति में आने की बात पर मुहँ बना रहे थे लाला। कुछ और लोग भी खड़े थे दूध की इन्तजार में। राजनीति पर बहस चल रही थी। मैंने मन ही मन सोचा, राहुल गाँधी को तो साँसद हुए दो साल हो गए। माशा अल्ला अब तो बोल भी लेते हैं सँसद में। कुछ देर में अह्सास हुआ, बात राहुल महाजन की हो रही थी।

"देश को युवा नेतृत्व की बहूत आवश्यकता है। चाहे राहुल महाजन हो या राहुल गाँधी। सचिन पायलट, ज्योतिरादित्य और अमर अब्दुला जैसों से बहुत उम्मीद है देश को"- बड़ी उम्मीद से बोल रहे थे एक बुजुर्ग।

"मगर ये अर्जुन सिहँ जैसे जगह खाली करें तब ना"- लाला का नौकर दूध की बाल्टी रखते हुए कूद पड़ा था बहस में। लाला ने घूर कर देखा तो नौकर खिसक लिया।

हमने भी फ़टाफ़ट दूध लिया और तेज कदमों से चल पड़े घर की और। आज फ़िर आफ़िस में देर हो जाएगी... . . . .

नोट: यह एक कल्पनिक कथा है।
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अनुगूँज 20: नेतागिरी, राजनीति और नेता

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