दिल्ली में कॉमनवेल्थ गेम हो रहे है
मेलबर्न में शीला दीक्षित पूरे लाव लश्कर के साथ पँहुचीं,
एश्वर्या के लटके झटके दिखाए पूरी दुनिया को,
गुलज़ार साहब से "दिल्ली चलो" का गान लिखवाया,
सच बताएं हमें भी बहुत अच्छा लगा टीवी पर देख कर।
यहां टाईम्स ऑफ इंडिया ने चलो दिल्ली अभियान चलाया
दिल्ली को Walled City to World City बनाने के लिए।
जमीनी हकीकत यह है कि दिन में आठ से दस घंटे बिजली गायब रहती है और पानी की कमी इतनी कि कभी कभी नहाने का इंतजाम मुश्किल हो जाता है।
Wednesday, April 26, 2006
वर्ल्ड सिटी दिल्ली
Friday, April 21, 2006
कैसे कैसे भगवान
अभी कुछ वर्ष पहले जब कन्नड़ अभिनेता राजकुमार का वीरअप्पन ने अपहरण कर लिया था तो उनके किसी भक्त ने हिम्मत न दिखाई? अरे जंगल में जा कर भिड़ जाते वीरअप्पन से। अब मर गए तो बंद पड़ी दुकानों को जला रहे हैं, ऐसी तो थोथि आस्थाएं हैं हमारी।
ऐसे बहुत से पात्र हमें मिल जाएंगे जिन्हे हमने भगवान बना कर पूजा और समय की धूल में भुला दिया। इनमें से कुछ का जिक्र मैंने अपने पिछले ब्लाग में किया है। मगर यहाँ मैं एक काल्पनिक पात्र के बारे में लिखना चाहता हूं। कुछ साल पहले स्टार प्लस पर एक सीरियल शुरू हुआ ”क्यूंकि सास भी कभी बहू थी", सीरियल का एक पात्र मिहिर मर गया, घरों में महिलाएं बिलख बिलख कर रोईं। समाचार पत्रों में भी मिहिर के मरने का समाचार छपा। आस्था देखिए कि आज भी इस सीरियल को नियमित देखा जाता है।
गणेषजी के दूध पीने का किस्सा तो सब को मालूम ही है।
दिल्ली में एक अफवाह फ़ैली कि एक बंदर सा दिखने वाला इंसान रात में छुप कर हमला करता है। सच मानिए न कोई घायल हुआ और न ही कोई यह कहने के लिए सामने आया कि हाँ मैने उसे देखा है, मगर पूरी पूरी कालोनियों के लोग रात रात भर जागकर पहरा देने लगे। अपने न्यूज़ चैनलों वाले भी सारी सारी रात कैमरा ले कर ढूंढते रहे उस बंदर को।
अंधी आस्थाएँ हैं हमारी, कोई तर्क मत पूछना।
Monday, April 17, 2006
एक अदद भगवान की जरूरत है
हमारा समाज नित नए भगवान गड़ता रहता है. हमारे यहां सब से ज्यादा देवी देवता हैं. हमारे देश में सांप से लेकर नदियों तक और सूरज से लेकर अमिताभ बच्चन तक की पूजा होती है. फिर भी हम नये नये भगवान बनाने की कोशिश करते रहते हैं.
“क्रिकेट हमारा धर्म है और सचिन हमारा भगवान” का उद्घोष करने वाला हमारा समाज क्यों नये नये हीरो बनाता है, उनकी अंधी भक्ती करता है फिर भूल जाता है कि वे भी एक इन्सान हैं एकदम हमारे माफिक. और फिर वही सचिन ज़रा आऊट आफ फारम हुआ कि उसे हूट करने लगते हैं.
क्या चाहते हैं हम? किसे खोज रहे हैं? क्या एसा तो नहीं है कि हमारे मनों में एक कमतरी का एहसास है और हम हमेशा यही सोचते हैं कि कभी कोइ दूसरा आएगा और सूपरमैन की तरह हमारे दुख तकलीफों को दूर करेगा. क्यों हम भीतर से शबरी और भीलनी बने किसी राम का इन्तजार करते रहते हैं? क्या इसी मानसिकता के कारण हमने अंग्रेजों को अपना माईबाप बना लिया था?
आज का समाचार पत्र मेरे सामने पड़ा है और मुख पृष्ठ पर धोनी छाए हुए हैं, लीजिए एक और भगवान बनने को है. कल से ये बताएंगे हमें कौन से साबुन से नहाना चाहिए या कौनसे टूथपेस्ट, शैंम्पू या कपड़े इस्तेमाल करने चाहिएं.
फिर हम अपने भगवानों के लिए मरने मारने पर उतारू हो जाते हैं. रामदेव को वृंदा करात ने कुछ कह दिया तो हर शहर में वृंदा करात के पुतले जलाए गये. दक्षिण में राजकुमार मर गए तो शहर में दंगा हो गया. आस्था में अंधे होकर हम तर्क वितर्क भी भूल जाते हैं.
अगली बार लिखुंगा : कैसे कैसे भगवान और कैसी कैसी आस्थाएं
अश्रेणीबद्ध
Thursday, April 06, 2006
गुजरात में
ये वेबसाईट वाले भी कैसे कैसे समाचार जोङ देते हैं. bbchindi.com पर आज की सुर्खियां हैं
आडवानी की रथ यात्रा शुरू.
गुजरात में भुकंप के हल्के झटके.
बिस्कुटों वाली बुआ
1968-69 की बातहै, मैं तीन या चार साल का रहा होंऊगा. अस्सी साल की वो बुङिया हमारे सामने के घर में रहती थी. कंकाल सी काया थोङी झुकी हुई, बेतरतीब से सफेद चांदी बाल. थोङा तुतलाते हुए पंजाबी बोला करतीं. सब उसे बिस्कुटों वाली बुआ कह कर बुलाते थे. एक आना यानी छह पैसे के दो बिस्कुट बेचा करतीं थी. मगर अब पाँच पैसे और दस पैसे चल पङे थे. मैं हमेशा पाँच पैसे के दो बिस्कुट ले आता था मगर वो एक पैसा फिर दे जाना कहना नहीं भूलती थीं.
मैं कभी कभी उसके पास ही सो जाया करता था. बाद में माँ उठा लातीं थीं उसके पास से. मुझे इसकी आदत ही हो गई. एक बार जब मैं माँ के साथ रोहतक मामा के घर गया तो रोने ही लगा, मुझे तो बिस्कुटों वाली बुआ के पास ही सोना था.
बिस्कुटों वाली बुआ जब गईं तो वो मेरा पहला अनुभव था मौत के साथ. मैं खङा रहा उसके कमरे के दरवाजे पर, उसे नीचे लिटा दिया गया था जमीन पर. सब कहते इस बच्चे को हटाओ कहीं डर ही न जाए मगर मैं वहीं टिका रहा कि अचानक उनकी बेटी जो शायद अमृतसर से आईं थीं जोर जोर से रोने लगीं. मैं शायद बहुत ज्यादा कुछ समझ न पाया था कि क्या हो रहा है!!!!!!!!!!!!!
Wednesday, April 05, 2006
जब प्राण तन से निकले

जब सिंधु ने यह पूछा कि आप ने कभी मौत के बारे में सोचा है तो मैं हैरान रह गया. मैंने अपनी जिंदगी में कितनी ही मौतें देखीं मगर कभी अपने लिए एसा नहीं सोचा. इतने साल हो गये बीमा बेचते मगर कभी किसी को मौत के बारे में नहीं याद कराया.
मगर वो बङी मासूमियत से पूछती है आपने वो भजन नहीं सुना
इतना तो करना स्वामि जब प्राण तन से निकले
गोबिंद नाम लेके जब प्राण तन से निकले.
उसे तो मैंने डांट ही दिया, एसा नहीं सोचते. मगर मैं खुद सोचता रहा सारा दिन. बचपन की वो बुङिया पङोसिन की मौत से लेकर दो साल पहले पिताजी का जाना एक एक कर सब दौङ गया दिमाग के परदे पर. सोचता हूं सब कुछ लिख डालूं. पता नहीं ब्लाग शुरू करने का यह तरीका ठीक है कि नहीं.

