कुछ सरकारी अफसर शाहों और इंटरनेट प्रदताओं की गफलत के चलते हमें अपना घर छोड़ना पड़ा और साहब अपना आईना उठा कर हम वर्डप्रैस पर आ गये हैं। यह हमारा ब्लागस्पाट पर आखिरी और वर्डप्रैस पर पहला पोस्ट है। अपनी मर्जी से आदमी चाहे वीजा ले कर अमेरिका, जर्मनी, इटली या कुवैत जा कर रहने लगे मगर जब दूसरे मजबूर करदें घर छॊड़ने को तो मन बहुत दुखता है।
सन १९४७ के यही दिन रहे होंगे जब मेरे माता पिता पाकिस्तान के एक गांव के अपने घर को छोड़ने पर मजबूर हो गये थे एक आजाद देश की खुली हवाओं में सांस लेने की एक उम्मीद लेकर.......


5 comments:
ab blogspot vapis aa gaya hai.. aap bhi aa jaiye..
अरे भाई बुल्ले शाह, अपने यहां तो अभी भी नहीं खुल रहा।
अब जो छोड़ दिया वहां वापिस क्या आएंगे, नया घर अच्छा लगने लगा है।
first hindi blog iv seen!!!!!!!!!!!
cheers!@ cool
घर छोड़ना एक पूरी दुनिया छोड़ना होता है .भले ही वह मज़बूरी में हो या ऐच्छिक . अवसाद की - कुछ कीमती खो देने की - एक कसक,एक टीस बनी रहती है . आशा है अंतर्जाल पर यह कमाल होगा कि घर बदलने बाद भी आपका पडोस नहीं बदलेगा .
आपका ब्लाग जानकारियों से पूर्ण है अच्छा लगा, मनोवेद के लिए अपना पता दें आप यूं ब्लाग पर मै मनोवेद का पता लिख दे रहा हूं आपने अच्छा ध्यान दिलाया
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