Friday, July 21, 2006

मेरा नया घर

कुछ सरकारी अफसर शाहों और इंटरनेट प्रदताओं की गफलत के चलते हमें अपना घर छोड़ना पड़ा और साहब अपना आईना उठा कर हम वर्डप्रैस पर आ गये हैं। यह हमारा ब्लागस्पाट पर आखिरी और वर्डप्रैस पर पहला पोस्ट है। अपनी मर्जी से आदमी चाहे वीजा ले कर अमेरिका, जर्मनी, इटली या कुवैत जा कर रहने लगे मगर जब दूसरे मजबूर करदें घर छॊड़ने को तो मन बहुत दुखता है।


सन १९४७ के यही दिन रहे होंगे जब मेरे माता पिता पाकिस्तान के एक गांव के अपने घर को छोड़ने पर मजबूर हो गये थे एक आजाद देश की खुली हवाओं में सांस लेने की एक उम्मीद लेकर.......

5 comments:

How do we know said...

ab blogspot vapis aa gaya hai.. aap bhi aa jaiye..

Jagdish Bhatia said...

अरे भाई बुल्ले शाह, अपने यहां तो अभी भी नहीं खुल रहा।
अब जो छोड़ दिया वहां वापिस क्या आएंगे, नया घर अच्छा लगने लगा है।

contraddict said...

first hindi blog iv seen!!!!!!!!!!!

cheers!@ cool

प्रियंकर said...

घर छोड़ना एक पूरी दुनिया छोड़ना होता है .भले ही वह मज़बूरी में हो या ऐच्छिक . अवसाद की - कुछ कीमती खो देने की - एक कसक,एक टीस बनी रहती है . आशा है अंतर्जाल पर यह कमाल होगा कि घर बदलने बाद भी आपका पडोस नहीं बदलेगा .

कारवॉं said...

आपका ब्‍लाग जानकारियों से पूर्ण है अच्‍छा लगा, मनोवेद के लिए अपना पता दें आप यूं ब्‍लाग पर मै मनोवेद का पता लिख दे रहा हूं आपने अच्‍छा ध्‍यान दिलाया