मेरा बाहरवीं का रिज्ल्ट आया था उस दिन। बहुत अच्छे नंबर आये थे। क्लास में टॉप किया था। मैं बहुत खुश था। में पल भर के लिये घर में क्या चल रहा है यह भी भूल गया था।
स्कूल से आया तो मेरे पास होने का गली में शोर सा मच गया। घर में जैसे ही घुसा तो एकदम ठिठक सा गया।
माँ बहुत बीमार चल रहीं थीं।
थोड़ी देर में माँ ने बुलाया, तकिए के नीचे से दस रुपये निकाल कर दिये।
कुछ बोल न पाईं।
इसके दो दिन बाद ही वो चल बसीं।
आज मातृ दिवस पर वो दस रूपये मिल नहीं रहे, जाने कहाँ रख दिये।
दस रुपये दो न माँ !!!!
Sunday, May 14, 2006
दस रुपये दो न माँ
Subscribe to:
Post Comments (Atom)


10 comments:
जगदीश जी,
पढ़कर ही आँखों में नमी आ गई।
जहाज के यह पंछी भी अपनी माँ से बहुत दूर बैठे हैं देखते हैं कब उड़ते हैं वापिस
शब्द नही जो भावना प्रकट कर सकें, यादों के झरोखे से देखता हूँ, तो अब सिर्फ़ सोच बाकी है. बहुत मार्मिक.
समीर लाल
वे दस रूपये खोये कहां है, वे तो आपके पास हरदम है, आपके दिल मे ।
हृदयस्पर्शी
बहुत कुछ लिखने को मन हुआ; शब्द साथ नहीं दे रहे,आँखो में बरबस पानी आ गया और कम्प्युटर की स्क्रीन भी साफ़ दिखाई नहीं दे रही, आप जिन्दगी में चाहे जितना पैसा कमा लें पर माँ के वे द्स रुपये अमूल्य हैं।
आपके खोए दस रूपये माँ की दुआ बन सदा आपके पास है
टिप्पणी कर सकूँ वो हालत न रही।
Thank you for your translations on the blog. It is very helpful. I watch these movies all the time. Sometimes I get translations from my mother or a friend just to see how badly I have misinterpreted the story!
पढ़कर आँखें नम हो आईं.. मुझे मेरे पिताजी की याद आ रही है.. इसी जनवरी में देहावसान हुआ है.
ye bhai tumne to rula diya. jara batana kaise likh lete ho itana achchha. apne dil me bhi bahut kucha bhara huva hai.lekin nikalta hi nahi jo bhi ho tume jara si bat me hi sabhi ko apne ma ki yadyno me dubo diya aoor mujhe comment likhane par mjbur kar diya. bahot bahot dhnya bad . hamesa yaisa hi likhana
Post a Comment