
जब सिंधु ने यह पूछा कि आप ने कभी मौत के बारे में सोचा है तो मैं हैरान रह गया. मैंने अपनी जिंदगी में कितनी ही मौतें देखीं मगर कभी अपने लिए एसा नहीं सोचा. इतने साल हो गये बीमा बेचते मगर कभी किसी को मौत के बारे में नहीं याद कराया.
मगर वो बङी मासूमियत से पूछती है आपने वो भजन नहीं सुना
इतना तो करना स्वामि जब प्राण तन से निकले
गोबिंद नाम लेके जब प्राण तन से निकले.
उसे तो मैंने डांट ही दिया, एसा नहीं सोचते. मगर मैं खुद सोचता रहा सारा दिन. बचपन की वो बुङिया पङोसिन की मौत से लेकर दो साल पहले पिताजी का जाना एक एक कर सब दौङ गया दिमाग के परदे पर. सोचता हूं सब कुछ लिख डालूं. पता नहीं ब्लाग शुरू करने का यह तरीका ठीक है कि नहीं.
Wednesday, April 05, 2006
जब प्राण तन से निकले
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3 comments:
ब्लॉग आत्माभिव्यक्ति का साधन है। इसलिये जो मन में हो, लिखते जाएँ।
धन्यवाद प्रतीक, मैंने शुरूआत कर दी है.
लगता है कि मैं भी जल्द ही अपना चिट्ठा (Blog) हिन्दी मैं लिखना शुरू कर दूंगा |
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